मुझे न याद आया

इस शहर की रोशनी में
मैं माटी के दिये जलाना भूल आया
मोमबत्तियों को कहीं
यूँ ही सिसकती छोड़ आया
मैं अपने गांव का घर
कहीं पीछे गुम कर आया
रंगीन रौशनी की चमक में
मैं अपना घर अंधेरा कर आया

मैं भूल आया
बाबू जी के मोटे फ्रेम वाले चश्मे को
माँ की चौड़ी पट्टी वाली साड़ी को
गांव के पुल पर
मैं बजता रेडियो छोड़ आया
पोखर में अठखेलियां करती मछली को
बंशी में बझाना भूल आया
रविवार की दोपहर का शक्तिमान
कहीं पीछे चलता छोड़ आया

इस शहर की इमारतों के बीच
मैं अपने गांव की सड़क भूल आया
जहां रोज चमकते दिखते थे तारे
वो घर की छत कहीं छोड़ आया
रस से भरे बगीचे का आम
खेत के गन्ने को बिन चूसे छोड़ आया
टाइल्स लगे फर्श को देख कर
मैं गोबर लगा आंगन भूल आया
गैस का बर्नर जला कर
मैं मिट्टी के चूल्हे की आग बुझा आया
इस दीवाली भी मुझे
मेरे घर का पता न याद आया—अभिषेक राजहंस

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 09/11/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 09/11/2018

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