फिर से इक दीप जले दिल में

जो   बसा   अंधेरा   मन   में  है
पतझड़  सा  तन  सावन  में  है
दिल   में   भरे   ऐहसास   नही
वाणी   में   भी    उल्लास   नही
बेचैन  रहो  जो  तुम  दिन   भर
हँस  न  पाओ  कभी  खिलकर
राहों    में    कांटे     भरे    मिले
सारे    घाव    जब     हरे   मिले
परेशानी  कैसी   भी   आ  जाये
पर दिल में  यही  कामना आये
सच कुछ  ईमान   मिले दिल मे
फिर से  इक  दीप  जले दिल मे

………..

भूल जाये  जब  पथिक राह को
तड़पे  फिर पाने  जो पनाह को
वो  देखे   पर्वत   चढ़ते   बादल
ऊँची    लहरों    वाले     सागर
इक ज्योति जले दिल के भीतर
मंजिल की ओर चले धीरज धर
जब   प्रेमी   को   न  प्यार  मिले
प्रेम  के  बदले   प्रतिकार  मिले
प्यार   नही  जो  अधिकार  करे
प्यार  वही   जो   स्वीकार   करे
आशायें उमड़े फिर  साहिल  में
फिर  से  इक  दीप जले दिल मे

……..

कुछ  हिस्से  जीवन  के  सुख में
कुछ  हिस्से  जीवन  के  दुख में
प्यार  की  दुनिया  है प्यार करो
प्यार से सब पर अधिकार करो
देखो   निरंतर     बहती     धारा
आश्रित  जिस  पर  जीवन  सारा
अगणित दीप  जलें  जब  थल  में
प्रकाश  उमड़ आये नभ जल में
मर्यादा  का  फिर  से  राम  मिले
हर राधा  का  फिर  श्याम  मिले
तन्हाई  बदल  जाये  महफ़िल में
फिर से  इक  दीप  जले  दिल  में

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 08/11/2018

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