दिवाली

दूर आसमान में, रात हर रोज़ दिवाली मनाती है,
हर शाम अपने घर को अनगिनत दियों से सजाती है…

रोज़ सांझ की आहट पे, लेती है विदा नीले बादलों से…
टांग देती है चाँद को आकाशकंदील की जगह..
सजाती है पूजा की थाल टिमटिमाते तारों की रौशनी से…

ये मंज़र तो सदियों से हर रात सजता है..
पर आजकल हमको ही कम दिखता है..

कभी छतपर खटिया पे लेट,
टकटकी लगाकर देखो आसमान में,
तारे आज भी पहले से झिलमिलाते हैं,
पहले सी बरसती है चाँद की चांदनी,
रात आज भी काली होती हैं..
बादलों पार तो हर रात दिवाली होती है..
बादलों पार तो हर रात दिवाली होती है…

5 Comments

  1. Abhishek Rajhans 07/11/2018
    • Garima Mishra Garima Mishra 13/11/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 08/11/2018
    • Garima Mishra Garima Mishra 13/11/2018
  3. mani mani 14/11/2018

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