महबूब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हकीकत है या, कोई ख्वाब दिवाने का
अदा उनकी है यह, या अंदाज़ लुभाने का।

इतनी शोखी, मुहब्बत की महबूब हो तुम
नजरें हों इनायत , मेहरबाँ शरमाने का।

मन है तसव्वुर, हकीकत के मोहताज नहीं
मयस्सर हुआ देखकर, तुझे मुस्कुराने का।

मुकद्दर किसी का , चंगा भला नहीं होता
हर जिंदगी ही गुलाम है, इन अफसाने का।

कभी पागल कह दिया, कभी दिवाना बिन्दु को
मौका मिला कहाँ, इश्क में गुनगुनाने का।

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  1. Abhishek Rajhans 07/11/2018

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