क्या फिर वो

वक़्त ने जो भर दिए थे घाव
उसने फिर आज उसे उभारा है
जो छोड़ गई थी एक बार तो
क्यों आज उसने फिर इशारे से बुलाया है
क्या कुछ रह गया था बांकी
जो आज उसने फिर जाल फैलाया है
तह लगा कर जो रख दिये थे जज्बात
आज फिर उसने उसे बाहर निकाला है
आँसूं सूख गए थे आंखों में, उसे बहाने
आज फिर उसने बादल को बुलाया है
तस्वीर जो पड़ने लगी थी धुंधली
आज फिर उसने उसे दिखलाया है
क्या फिर वो
दिल को तोड़ने का कारोबार करने निकली है
क्या फिर वो
हाथ मे खंजर लेकर
दिल का लहू बहाने निकली है.—अभिषेक राजहंस

2 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 30/10/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/11/2018

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