प्राकृत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

काल के कपाल पर भी लिखा है काल है
चक्र सा जो धूम रहा वह जो विकराल है।

कौन यहाँ जानता वक्त को पहचानता
हर नर – नारी ये क्यों कर रहा सवाल है।

खुद नष्ट कर रहा प्राकृत के अनुराग को
नदियाँ पहाड़ वन उपवन का बुरा हाल है।

खनन प्रदूषण ये धुआं धुआं आकाश क्यों
सूखा है बाढ़ कहीं पड़ गया अकाल है।

जल वायू परेशाँ है कचरों का मार से
संतुलन बिगाड़ रहे क्यों ये जंजाल से।

छेड़ छाड़ कर रहे तो नुकसान हो रहा
समझायें कैसे आँधी तुफान भुचाल है।

दौलत और शोहरत में भूली ये दुनिया
दे रही दावत क्यों बचाव में बवाल है।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/10/2018

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