महा पंडित – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपने मन के रावण मारो, इतना तो जरूरी है
दहन करते तुम रावण को, क्या तेरा मजबूरी है।
खूब जश्न मनाते हो तुम, खूब दिखावा करते हो
रावण के पुतले जलाके, अपने को शेर समझते हो।

एक रावण को जला दिये, तो क्या रावण मर जायेगा
अपने भीतर के दानव मारो, मानव तुम बन जायेगा।
हरण किया सीता को उसने, मर्यादा के साथ रहा
मुक्ति इसी में थी रावण की, वादा जिसके साथ रहा।

महा पंड़ित ज्ञानी था वह, चारो वेद का ज्ञाता था
भूत भविष्य वर्तमान जानता, शिव के गुण गाता था।
देवता थे वश में उसके, वश में सारी दुनियाँ थी
सोने की लंका थी उसकी , अलग थी उसकी खूबियाँ।

शनि देव झाडू करते थे, थी ये उनकी मजबूरियाँ

अपने ही गर्दन काट वह, दस बार शीष चढ़ाया था
ऐसे शिव शंकर को उसने, वश अपने कर डाला था।

बड़ी घोर तपस्या से उसने, मन वांक्षित फल पाया था
माया ममता लोभ अंहकार, क्रोध को ललकारा था।
ऋषि मुनियों के संचित रज से, घड़ा एक भर डाला था
लंका से घट लाकर उसने, मिथिला में गड़ डाला था।

हाहाकार आकाल मची, शिव शंकर सपने में आये
जनक राजा हल सोने का ले , अपने हाथ चलाये।
चलते चलते अटक गयी हल, घट बीच में जब आया
झमाझम वारिस की बूंदे, घनघोर घटा जब छाया।

खुशियों से झूम गये जब, सीता को जनक ने देखा
चारो तरफ छाई खुशहाली, प्रजा भी उसे निरेखा।
त्राहि माम करती प्रजा को, जान में जान है आई।
राजा जनक को संतान सुख, सीता से ही मिल पाई।

ऋषि मुनियों की बेटी थी वह, वेद ऋचा विभूति थी
रावण के मुक्ति कारक थी, जनक दुलारी अभिरूचि थी।
मन में सोचा था रावण, स्वर्ग में सीढ़ी लगा देंगे
इन नदियों को दूध बना, पानी में आग लगा देंगे।

कर सकता था रावण ऐसा, बड़ी बात नहीं थी उसकी
पर विधना को मंजूर कहाँ था, दुनियाँ बनी है जिसकी।
सुर्पनखा की नाक कटी, तब देख न पाये इस हाल में
बस राम से मुक्ति पाना था, जो उलझ गये इस जाल में।

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