बिना खौफ के

बिना खौफ के

खौफ का साया
जियादा ही डराता है
बनिस्पत खौफ के,

फाड़े गए कागजों की चिन्दियों से
बास्केट भरी पड़ी है
मुश्किल है लिखना मारे खौफ के,

मर्दों को कब जज्ब है
तेरा ये जज्बा
निकालना तेरा सड़क पर बिना खौफ के,

लिखना तो दूर है
सोचना भी गुनाह हो गया
उंगलियां कांपे हैं लाईक करने में भी खौफ से,

आफतों की इस बरात का
दुल्हा मैं ही हूँ
मैंने ही चुना था ये रिश्ता बिना खौफ के,

पहले तेरी अदाओं को प्रहसन समझ
हंस लेता था
अब तो होंठ सील से गए हैं मारे खौफ के,

जब भी तारीख के पन्ने पलटे जाएंगे
तेरा पन्ना खुलते ही
लोग आँखें बंद कर लेंगे मारे खौफ के,

आजिज़ नहीं है आदमी
कारवाँ बन रहा है आहिस्ता आहिस्ता
उठ्ठ खड़ी होगी कौम एक दिन बिना खौफ के,
अरुण कान्त शुक्ला
२३ अक्टूबर,२०१८

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/10/2018
  2. Rinki Raut Rinki Raut 26/10/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/10/2018

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