मौत आ जाए मगर ………..

गुफ़्तगू हो शायरी में शायरी में गम न हो
हो इनायत बस खुदा की आँख कोई नम न हो

हो मुहब्बत इस फ़िजा में आसमां हो ख़ुशनुमा
दे सुनाई मुस्कुराहट दर्द का मातम न हो

आरजू का है इजाफ़ा कम न होती प्यास है
पेट भर जाए गरीबी भूक का आलम न हो

सोच लो की भागना है कब तलक यूँ दर्द से
चाह में अच्छे दिनों के हादसे कायम न हो

खूब देखे हैं नज़ारे मौत से लिपटे हुए
मौत आ जाए मगर वो जिंदगी से कम न हो
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शशिकांत शांडिले, नागपुर
भ्र.९९७५९९५४५०

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 24/10/2018

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