मुलाकातें – शिशिर मधुकर

मुलाकातें बड़ी मुद्दत से अपनी हो ना पाई हैं
तेरी राहें सदा तकती ये आँखें सो ना पाई हैं

बड़ा तूफान आया था और बरखा हुईं जमकर
निशां अपनी मुहब्बत के बौछारें धो ना पाई हैं

ज़माना तो मुहब्बत को फ़साना ही बताता है
ग़म थोड़ा घटाने को ये अंखियां रो ना पाई हैं

कभी सोचा नहीं था ज़िंदगी के ख्वाब टूटेंगे
लाशें मुझसे कभी कांधे पे उनकी ढो ना पाई हैं

भले कश्ती मेरी टूटी और बिखरा है सामां भी
मगर लहरें मेरी हसरतें अभी डुबो ना पाई हैं

शिशिर मधुकर

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 12/10/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/10/2018

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