चाँदनी बिन – शिशिर मधुकर

मुहब्बत कर तो ली मैंने मगर अब हाथ खाली हैं
दिल की चौखट पे लो आ गए फिर से सवाली हैं

पात सब झर गए कब के हवा ऐसी चली दुष्कर
फलों के बोझ से झुकती नहीं अब मेरी डाली हैं

ना जाने सोच कुदरत ने ये क्या चक्कर चलाया है
फ़सल सब काट लेते हैं जब भी पकती ये बाली हैं

मुकद्दर नें कभी जग में मेरा तो हाथ ना पकड़ा
हर एक रिश्ते में मुझको फ़कत मिलती ही गाली हैं

अब कोई चाँद अम्बर में नज़र आता नहीं मुझको
चाँदनी बिन यहाँ मधुकर ये रातें कितनी काली हैं

शिशिर मधुकर

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/10/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/10/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 11/10/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/10/2018

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