गुमसुम हैं सारे – शिशिर मधुकर

ताकत जब से बढ़ने लग गई कमरे की दीवारों में
अब अपनी भी गिनती होती है तन्हाई के मारों में

पढ़ लिख के गुमसुम है सारे बात करे न अब कोई
सूनापन पसरा है देखो तो गलियों और चौबारों में

दिल से गायब हुईं मुहब्बत पत्थर दिल अब इंसा है
संगीत कोई ना बजता है इन ऊँची ऊँची मीनारों में

शर्म और हया काफूर हुईं हैं मर्ज़ी के सब मालिक हैं
लाली अब ढूंढे से ना मिलती है गोरी के रुखसारों में

जब से जीवन का मतलब बस आगे जाने की चाह हुई
अपनापन मधुकर ना मिलता है अपनों के व्यवहारों में

शिशिर मधुकर

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/10/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/10/2018

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