पान का गीत

छप्पर-छानी सजी हुई है
परवल पान रतालू की बारी में भीगी
वर्षा ऋतु की गमक अभी तक बसी हुई है

चैत गया बैसाख आ गया
महुआ चूनेलगा
लपट लू की झुलसाने लगी
तवे-सी तपती धरती लेकिन फिर भी
पनवारी की बारी में
हरियाली की ऎसी रंगत है ऎसी धज है…

जैसे कोई नया-नवेला
बप्पा से आँखें बरका कर
पान दबा कर चोरी-चोरी
पनवारी के दर्पन में
अपनी मुखशोभा देख रहा हो
और भीगती हुई रेख का दर्प
दीप्त कर दे दर्पन को!

हरियाली के भीतर-भीतर उठती गिरती
एक लहर उससे भी गहरी हरियाली की!

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