मेरी जिंदगी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

कभी हंसाती है तो कभी रुलाती है मेरी जिंदगी
ना जाने क्या – क्या खेल दिखाती है मेरी जिंदगी।

हम तो गफलत में ऐसे इसी तरह भटकते रहे अबतक
मेरी नदानियों को अब भी सिखाती है मेरी जिंदगी।

कछुए जैसी चाल पर किसी की जिंदगी अब नहीं चलती
वक़्त के हर इक पल को भी बतलाती है मेरी जिंदगी।

लोभ क्रोध माया ममता सब के सब भ्रम में डालते हैं
कलंक तो कभी पाप से हमें बचाती है मेरी जिंदगी।

बहुत देखे हैं मैंनें पत्थर दिल को प्यार में पिघलते

  • उम्मीद की किरणों से मुझे जगाती है मेरी जिंदगी।

3 Comments

  1. kiran kapur gulati Kiran Kapur Gulati 25/09/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/09/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 26/09/2018

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