पत्तों से ढह गए – शिशिर मधुकर

सच के लिए हम तो यहाँ लड़ते ही रह गए
अरमान ज़िन्दगी के सब पानी में बह गए

राजा ही जब ख़राब हो जनता भी क्या करे
मन मार कर के लोग अत्याचारों को सह गए

कौवा जो मोती खा रहा है आज के समय
ये बात कितने गुणी जन पहले ही कह गए

नैतिकता का इंसान की ऐसा हुआ पतन
सच के ये महल ताश के पत्तों से ढह गए

उम्मीद थी जिनसे की वो शायद करेंगे न्याय
मधुकर वो ही हरदम यहाँ देते थे शह गए

शिशिर मधुकर

8 Comments

  1. kiran kapur gulati Kiran Kapur Gulati 25/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/09/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/09/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 26/09/2018
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/09/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 01/10/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/10/2018

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