ज़लवा – डी के निवातिया

ज़लवा
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जरुरी नहीं दुनियाँ में सिर्फ हुस्न का ज़लवा हो
हमने तो कीचड़ के हिस्से में कमल को देखा है
अभद्र हो या दीन-दरिद्र कद्र हर शै: की होती है
पत्थर  बुतो में झुकते कोटिश जनों को देखा है
मेरी सूरत पे ना जाओ यारो बदसूरत हूँ तो क्या
हमने तो लंगूरो पर अच्छी हूरों को मरते देखा है !!
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डी के निवातिया

6 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 20/09/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/10/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 22/09/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/10/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/09/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/10/2018

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