वक्ती खेल – शिशिर मधुकर

आज हम गैर लगते हैं कभी पर थे तुम्हें प्यारे
कोई शिकवा नहीं तुमसे ये वक्ती खेल हैं सारे

खुदा ने दिल दिया है तो इसमें जज्बात होते हैं
काश धडकन में अपनी नाम वो मेरा भी पुकारे

बड़ा मजबूत दिखता है महल वो दूर से सबको
मगर गुम्बद को इसकी भी तो ज़रूरी हैं सहारे

माना ज़माने भर की निगाह पीछे हैं हर समय
तुम दे नही सकते क्या कोई भी छुप के इशारे

तन्हाइयों की इस आग ने मेरा झुलसा दिया बदन
मधुकर तुझे देखे है बस अब तो दोनों बाँह पसारे

शिशिर मधुकर

10 Comments

  1. Nishkarsh kaushal 19/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/09/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/09/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/09/2018
  4. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 20/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/09/2018
  5. अंजली यादव Anjali yadav 20/09/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/09/2018

Leave a Reply