काया-की-माया रतनजोति

तरह-तरह की दूरियाँ
और विस्तार
पार कर लौटा अपने द्वार
सँभाले भुवनभार,
चौखट पर झूले-
झुके आ रहे हैं किवाँर
मेरे ऊपर

लाँघी देहरी-आँगन-दलान
चूल्हा-चौका सारा मकान
जिसमें अब रहता आसमान
धुँधला धुँधला

जल्दी में छूट गई थी खूँटी पर कमीज़
सो झूल रही है भारी-भारी
धूल भरी
यह मेरी ही काया किशोर –
वय की छूटी
जो यहीं रही
मिट्टी-पानी में सराबोर
सो अविगत-गति में
सुधियाती-सी
ताक रही है इसी ओर
बाहें निढाल
तन का ताना-बाना मलीन
यह शरदकाल
की कमलनाल

इस बीच न जाने और कौन
आ बैठा टूटी कुर्सी पर
इस ओर पीठ
तो तुम हो ये
मेरी ही एक और काया
वैसी ही गब्बर और ढीठ !

पूरब की तरफ घड़ौंची से
वह कोई एक और निकला
वह कोई बर्तन माँज रहा है
नाली पर
फिर कोई और
रसोई में… वह रतनजोति !
इतने शरीर यह सब मेरे
इनसे ही भरता चला जा रहा
देशकाल…

मैं बहुत दिनों के बाद
दूरियों की दुनिया से लौटा हूँ
सो आ पाया हूँ काया में
तुम समझ रहे थे
क्या यूँ ही
काया की माया के पीछे
मन पागल डोला करता है !

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