मुक्तक

(1)

कभी जो रात में उठता , तुम्हारा संदेश मिलता है

जुदाई का हथौड़ा फिर , दीवार-ए-दिल पे गिरता है

तड़पन और उदासी संग , फिर महफ़िल सजाते है

प्यार के बीज को आसूँ से सींच , शायरी का फूल खिलता है

(2)

समंदर की गहराइयों से , ये पैगाम आया है

जमाने से लुटे लोगों में , मेरा भी नाम आया है

मोहब्बत की है तो फिर टूट के , बिखरना भी जरूरी है

इससे बचने को न पैतरा , कोई भी काम आया है

(3)

वो कहते है समंदर पार की , गलियां तुम्हारी है

इस दिल मे जो धड़कती है , वो धड़कन तुम्हारी है

मगर मुश्किल बस इतनी है , इस जाहिल जमाने मे

जो किसी को रास नही आती , वो जोड़ी हमारी है

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

4 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 16/09/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/09/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 17/09/2018
  4. davendra87 davendra87 17/09/2018

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