आँखिन देखी

आँखें तो देख ही लेती हैं
औपचारिकता में छुपी हिंसा को,
बेरुखी का हल्का से हल्क रंग
पकड़ लेती है आँख
फिर भी बैठे रहनापड़ता है
खिसियानी मुस्की लिए,
छल-कपट ईर्ष्या भी
कहाँ छुप पाते हैं
आँखों से
सात पर्दों के भीतर से भी
आँख में लग ही जाता है धुँआ,

कठिनाई ये है
कि अपनी ही आँखों का देखा
ख़ुद हम तक बहुत थोड़ा पहुँच पाता है
ख़ुद हम ही रोक देते हैं उसे बीच में,
अनदेखा करते जाना
जैसे जीने की कोई शर्त हो!

Leave a Reply