शिव चालीसा

गणपति का कर ध्यान, वन्दना शिवशंकर की |
करूँ शम्भु गुणगान, अर्चना गंगाधर की ||
महामूढ़ शिवदास, दीन अतिशय अज्ञानी |
करो सर्व कल्याण, सदाशिव अवढरदानी ||

शिव शास्वत सात्विक शम्भु प्रभो |शशिशेखर शंकर सर्व विभो ||
शितिकंठ सदाशिव सोम हरे |शिपिविष्टि अनंत त्रिशूल धरे ||
अजपाजप मंत्र त्रिनेत्र जपी |त्रिपुरान्तक रौद्र कठोर तपी ||
विरूपाक्ष दिगंबर साम्ब सदा |मृगपाणि सदा हरते विपदा ||
भगवान तुम्ही प्रमथाधिप हो |सुर पूजित वन्दित मंडित हो ||
तुम आदि अनादि अखंडित हो |निगमागम विज्ञ सुपंडित हो ||
तुम शुद्ध अगोचर गोचर हो |सब देवन के तुम ऊपर हो ||
तुम देव दयानिधि हो कवची |तव आयसु से विधि सृष्टि रची ||
रुर रोहित रूद्र विलोहित जी |तन अंग विभूति सुशोभित जी ||
भव क्रोध अघोर कठोर अहो |डमरूधर नाथ त्रयम्बक हो ||
निज भक्तन के तुम रक्षक हो |भवबंधन पाशविमोक्षक हो ||
विष वारिधि मंथन से निकला |फिर तो विष था बन ज्वाल जला ||
विष से तब दग्ध त्रिलोक हुआ |सचराचर को अति शोक हुआ ||
विषपान किया शिवशंकर ने |सचराचर कष्ट हरा हर ने ||
जब दक्ष प्रजापति यज्ञ किये |सब देवन को बुलवाइ लिये ||
शिव को न निमंत्रण दक्ष दिये |मखमध्य सती अपमान किये ||
दुःख से तनुजा तन भस्म हुआ |शिव के उर को अति क्षोभ छुआ ||
पटकी शिव ने करि क्रोध जटा |फिर ज्वाल जली गिरिराज फटा ||
प्रगटा गण एक प्रचंड महा |शिव आयसु दो कर जोड़ कहा ||
तुम जाकर यज्ञ विध्वंस करो |शठनायक दक्ष घमंड हरो ||
गण ने मख नष्ट किया क्षण में |अपमानित देव हुए रण में ||
रणमध्य प्रजापति शीश कटा |शिव की जय दक्ष घमंड हटा ||
वन में तप उग्र उमा करके |हरषी गिरिजा शिव को वरके ||
प्रलयंकर रूप दिगंबर का |करते वध शम्भु जलंधर का ||
अति घातक क्रोध महेश्वर का |पुर ध्वस्त किया त्रिपुरासुर का ||
करने तप भंग मनोज चला |शिव क्रुद्ध हुए फिर काम जला ||
शिव भक्ति जनार्दन श्रेष्ठ किये |शितिकंठ उन्हें वरदान दिये ||
तप योग भगीरथ जी करके |प्रिय भक्त बनें शिवशंकर के ||
जब गंग प्रचंड सवेग बही |जलधार जटाधर शीश रही ||
फिर गंग तरंग घमंड घटा |हरषे शिवशंकर खोल जटा ||
अघनाशक मध्यम धार बही |सुखदायक देवपगा नित ही ||
शिव का तप रावण वाण किये |धन वैभव शंकर दान दिये ||
उपजे जब क्रूर पिशाच घने |शिवशंकर श्री हनुमान बने ||
जय तारक रूद्र जटाधर की |जय भर्ग अनीश्वर श्री हर की ||
जय अव्यय भीम महेश्वर की |जय रूद्र प्रजापति ईश्वर की ||
जय नित्यस्थाणु त्रिलोचन की |जय शंकर पाश विमोचन की ||
शिव अर्चन जो जन नित्य करे |सुख देकर शंकर पाप हरे ||
मृड उग्र गिरीश वृषांक अहो |मनभावन ब्रह्म कृपालु रहो ||
हरये हरिकेश सहस्रपदे |नटराज प्रभो मुझको वर दे ||
शिव भक्ति सदा शिवदास करे |शिवओम सुधारस वृष्टि झरे ||

शिव का अद्भुत ठाठ ,शिवशंकर महिमा अमित |
शिव चालीसा पाठ ,सुन्दर सुखदायक सुखद ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
mo -9582510029

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/08/2018
    • acharya shivprakash awasthi Acharya Shivprakash Awasthi 30/08/2018

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