जिंदगी संवरने का नाम नहीं लेती

        ये जिंदगी  संवरने का, नाम  नहीं लेती

उसे सोचने के अलावा, काम नहीं लेती

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देता  हूँ  हर  कीमत , तुम्हे  भूल  जाने  की

मगर मुँह मांगा भी , ये कुछ दाम नहीं लेती

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जानती  है  कि दर्द है ,  तुम्हारी यादों में

भूलेगी तुमको इसलिये, जाम  नहीं  लेती

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हरदम सोचती तुझे , थककर चूर हो जाये

फिर भी थोड़ा रुक कर , आराम नहीं लेती

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पहला ऐसा काम है , जो  मुकम्मल हुआ है

इतनी  जिद्दी  है  कि, ये  ईनाम  नहीं  लेती

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जब  तड़पन, उदासी, आँसू  से  भर चुकी है

फिर इन धड़कनों को तू , क्यों थाम नहीं लेती

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/08/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/08/2018

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