विनाशकारी कलयुग ( कविता)

कलयुग का यह विनाशकारी रूप ,

हमारा भाग्य हमें दिखा रहा .

विकास का चेहरा दिखाते हुए ,

इसका कदम तो पतन की ओर बढ़ रहा .

ज्ञानियों से सूना था इसका बखान ,

कल (मशीन) होगी इसकी पहचान .

मगर ‘कल’ के अधिक प्रयोग से ,

मशीन (कल) ही बन गया हर इंसान .

‘कल ‘ नहीं हम तो इसे कहेंगे ,

कलह का भद्दा ,भयावह युग.

अनेक प्रकार के जघन्य अपराधों,

व्यभिचार , हिंसा का रोद्र युग .

मानवीय मूल्य , सभ्यता,संस्कृति ,

संस्कार सब तो लुप्त हो गए .

धर्म ने अधर्म का रूप ले लिया ,

साधू-संत चरित्रहीन औ व्यवसनी हो गए.

शर्म-लिहाज़ ,मानवता ,प्रेम ,दया -करुणा ,

तो आज के मानव में बची ही नहीं है .

नारी और प्रकृति का सम्मान /सुरक्षा

जैसी भावना लेशमात्र भी इसमें बची नहीं है.

पाप की पराकाष्ठा इतनी हो गयी ,

की अब धरा भी पापियों के बोझ से झुकने लगी है.

अति-शीघ्र लो प्रभु अब कल्कि अवतार !,

कलयुग के अत्यधिक संत्रास से वोह थकने लगी है.

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/08/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/08/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/08/2018

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