इश्क़

“लोग कहते जिसे मेरी दीवानगी
वो तेरे इश्क़ की इंतहा है सनम।

तुम भी गर इसे आवारगी का नाम दे दोगे
रहनुमा कोई इश्क़ का मेरे बाद न होगा”

मेरे आंसुओं से पूछो क्या खूब जिंदगी है
तेरी आरजू की लौ में जलती हर एक खुशी है।

साथी हजार होंगे चाहत के कारवां में
कोई हमसफर न हो तो बेआस जिंदगी है।

तूफान के सहारे साहिल पे आ गए हैं
पतवार से तो बेहतर तूफ़ां की बंदगी है।

शहर की गलियों में कितने आईने टूटे पड़े हैं
फिर भी लोग कर रहे पत्थरों से दिल्लगी है।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/08/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/08/2018

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