यूं ही

हर पल एक नया इम्तिहान लेके आया है
वक़्त ठोकरों भरा इनाम लेके आया है

कदम रुक जाएंगे ऐसी तो कोई बात नही है
हर मोड़ पर मंजिलों का पैगाम लेके आया है।

अब सोचता हूँ शर्म से नजरें झुकाये क्यों चलूँ
इसी राह पर चलने का जब फरमान लेके आया है।

इस धूप की बिसात क्या मंजर जला सके
सहराओं में बारिश का इंतजाम लेके आया है।

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चाँद तारों की तरह फिर कोई तस्वीर हो जाये
तेरी तकदीर से रोशन मेरी तकदीर हो जाये।

मैं तेरे वास्ते जिऊँ तू मेरे वास्ते जिये
जिंदगी प्यार की लिखी हुई तहरीर हो जाये ।

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ये चाहते हैं सब कि उसको भूल जाऊं मैं मगर
भूल कर उसको मैं खुद को याद भी कैसे रखूँ ।

उस हसरते गुलफाम की मंजिल नही मै,जानता हूँ
वो नही मेरी नजर में,ये मगर कैसे कहूँ।

मुश्किलें ही बख्सी है इस जहां की रहमतों ने
छोड़ कर तन्हा उसे किसी राह पर कैसे चलूं।

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देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

One Response

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/08/2018

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