यादों का बोझ – शिशिर मधुकर

मैं तो यहाँ बेचैन हूँ वो फुरसत में सोते हैं
कातिल आशिकी में क्या ऐसे ही होते हैं

सजदा करा इंसान को जिसने समझ खुदा
दिल का करार ऐसे ही सारे लोग खोते हैं

मुझको बुला के छत पे वो धीमे से छुप गए
बादल बरस के ये मगर मुझको भिगोते है

ज़ख्म कुछ ऐसे मिले हैं उल्फ़त की राह में
दिल पे लगे ये दाग़ अब असुअन से धोते है

सब कुछ भुला आगे बढ़ो ये ही है ज़िंदगी
यादों का बोझ जाने क्यों फिर लोग ढोते हैं

शिशिर मधुकर

8 Comments

  1. davendra87 देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत" 22/08/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/08/2018
  2. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 22/08/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/08/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/08/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/08/2018
      • C.M. Sharma C.M. Sharma 27/08/2018
        • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/08/2018

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