ज़िन्दगी

ज़िन्दगी को तसल्ली
किस बात की दूँ
जिन्दगीं तसल्ली भर जी चुका हूँ
अब और रब से मांगू क्या
हाथ फैलाकर
अब तो मुट्ठी बंद कर चुका हूँ
अरमानो के कारवां के साथ कितना चलूँ
अब चलते-चलते थक चुका हूँ
बदनामियों के कालिखे
और कितने लगाऊँ
आज सुबह ही तो शक्ल धो चुका हूँ
वक़्त अक्सर सिरहाने बैठकर बोलता है मुझसे
कुछ और स्याही बहा दो अपनी कलम से
मैं सारे किस्से तो ज़िन्दगी के लिख चुका हूँ
अब और रंग कितने भरूं ज़िन्दगी में
सारे बाल धूप में सफ़ेद कर चुका हूँ
अब ख्वाब कोई नया कैसे बुनूं
आँखों से ख्वाबो वाली नींद तोड़ चुका हूँ
ज़िन्दगी को तसल्ली
किस बात की दूँ
अब मौत के इंतजार में
ज़िन्दगी की करवट बदल चुका हूँ—अभिषेक राजहंस

2 Comments

  1. अंजली यादव Anjali yadav 15/08/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/08/2018

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