दिल के टुकड़े हजार करते है

जुबाँ कड़वी हो कितनी भी , तुम्ही से प्यार करते है
तेरी तस्वीर से भी हम तो , आँखें चार करते है

ये परदे में तुम्हारा हुस्न जो , रौशनी बिखेरता है
इसी से रात अपनी रौशन , हर बार करते है

भले मार्ग मिलन के अब , सभी अवरोध हो गए है
मगर दिल की इन आँखों से , तेरा दीदार करते है

तुझे जो था पसंद मिलना मुझे , क्यों उल्टा हुआ है अब

तुझे न हो पसंद फिर भी , ये गुस्ताखी हर बार करते है

तू मुझसे दूर हो जाये , नैनों से नूर खो जाए
मगर आशिक पुराने है , कि दिल से संचार करते है

फटी किस्मत है इतनी कि , रफू बार बार करते है
तुमसा भी नहीं जो , दिल के टुकड़े हजार करते है

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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