लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं
हम इसे साये-मौत की दिल्लगी कहते हैं।

ये छलकते जाम भी इक साज से होते हैं
हम प्यासे इसे महकती बंदगी कहते हैं।

इस घर के सामने बेघरों की जो भीड़ है
वे ही इसके मलबे को गंदगी कहते हैं।

ये चिथड़ा कमीज, ये फटी नीकर कुछ तो है
इस गरीबी को लोग तो सादगी कहते हैं।

बासी रोटी से उठती भूख की खश्बू को
गरीब बच्चे बेचारे ताजगी कहते हैं।

गरीब की झोपड़ी जलाकर खाक कर देना
हरेक मजहब इसी को दरिंदगी कहते हैं।
…… भूपेन्द्र कुमार दवे
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  1. अंजली यादव अंजली यादव 13/08/2018

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