दोहे- Bindeshwar Prasad Sharma (bindu)

01

जनता के दरबार में, जोड़े मिलकर हाथ
सभी देखते रह गये, कोय न देता साथ।

02

दुख जो बाटन मैं चला, औ दुख लाया ढ़ोय
आपन दुख छोटन लगा, दिल जब अपना टोय ।

03

जैसे तैसे बढ़ रहा, बाजारों के भाव
देख रहा कोई नहीं, हो कैसे बदलाव।

04

पलायन कर भाग रहे, छोड़े अपने गाँव
खेत – खलिहान रो रहे, उखड़े उनके पाँव।

05

मन से रावण दूर कर, दिल में राखो राम
कष्ट घटेगा आपका, बन जाये सब काम ।

06

बड़ को आदर कीजिये, छोटों को सम्मान
बनी रहे ये आचरण, बनी रहे ये शान।

07

माया में है पड़ रहा, छोड़ो ममता लोभ
अंह क्रोध को छोड़ दो, बदलो मन का क्षोभ ।
क्षोभ – व्याकुलता

08

अलख जगाओ प्रेम का, होगा तभी सुधार
निर्मल मन जो वह गये, जस पानी की धार ।

09

लोहे सा जो तप गया, जानो बज्र समान
जैसे दधीचि बन गये, अस्थियों से महान।

10

चौड़ी छाती सत्य की, जिधर देखना देख
सब पर ये भारी सदा, है विधान का लेख ।

11

नेता जी सुभाष चंद्र, बनता देखो कौन
नजर अब तक न आ रहा, कोई तो है मौन।

12

लूट लिये सरकार को, कुछ सरकारी लोग
नेता चक्कर में पड़े, खूब कर रहे भोग।

13

ढूंढे सूरज चाँद को, लिये मिलन की आस
जैसे होता पास में, थम जाती तब साँस।

14

ऐसा ज्ञानी देख लो, मूरख काली दास
जिस डाल वो बैठ गये, काट भये उपहास।

15

चन्द्रमरीचि देख कर, मत जाना घबराय
वह तो पूरण बन गये जस सीता रधुराय।

16

भक्त और भगवान का, है बंधन अनमोल
युगों – युगों से चल रहा,जैसे मीठा घोल।

17

छलिया है जो छल रहा, करके मीठी बात
अपनी रोटी सेक कर, मारे उस पर लात।

18

बड़ी लगी है लालसा, बड़ी लगी है आस
मेहनत लगन साथ हो, तो बुझेगी प्यास ।

19

हजम कर गया केकड़ा, माटी जल के साथ
उसके बच्चे बच गये, मौत चढ़ गयी माथ ।

20

खुशियाँ सगरी बट रही, घर आयो उल्लास
राम चन्द्र की पालकी, मूढ़ करे अट्टहास।

21

गंगा स्नान जो करे, मिट जाये सब पाप
शक्ति बड़ी सब जानते, दूर करे संताप।

22

योगी सारे बन गये, मठ अब कौन बचाय
मठ ज्ञानी का दीप था, उसको रहा जराय।

23

बड़े रसीले होठ है, मस्त गुलाबी गाल
बड़े – बड़े दो नैन है, हिरणी जैसी चाल।

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