विधा : कहमुक़री

सुबह शाम   मैं   उसे   रिझाऊँ
नैन पलक पर  जिसे    बिठाऊँ
बिन  उसके   दिल    है  बेहाल
क्यों सखि साजन?ना गोपाल

घड़ी – घड़ी   मैं   राह   निहारूँ
सुबह  शाम  नित  उसे पुकारूँ
दरस    बिना,  जीवन   बेकार
क्यों सखि साजन,न  करतार

जा   कारे   के    हम     दीवाने
कर   डारै     बा     नै     बेगाने
छोड़ गयो,ज्यूँ  रह्यो  न काम
का सखि साजन,न घनश्याम

दूर   रहे   नहीं  पास   वो आये
फिर  भी   मेरे  दिल  को भाये
धवल   रूप,  नैनों     में    शेष
का सखि प्रीतम, नहीं   राकेश

नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष

+91 9549899145

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/07/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 23/07/2018

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