इश्क़ की मंज़िल के हम अनुवाद हो गए…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

नज़रों से हम तेरी तो आबाद हो गए….
थे रकीब मेरे जो सब बर्बाद हो गए…

दिल रहे बेचैन तेरे दीद के लिए…..
तुम न जाने ईद का क्यूँ चाँद हो गए….

कर वफ़ा दिल टूटना तो आम हो गया….
हम वफ़ा नफरत तेरी नाशाद हो गए….

बन गले का हार मुझको ऐसे तुम मिले…
जिस्म दो इक जान के संवाद हो गए….

ज़िन्दगी ओ मौत की हद्द पार कर गए….
इश्क़ की मंज़िल के हम अनुवाद हो गए….

घास मत डालो कभी उन मंद इंसां को….
इश्क़ के बेवजह जो प्रतिवाद हो गए….

चुप्प तुम ‘चन्दर’ रहो शोर न करो अब….
लो मुहावरे भी ग़ज़ल के स्वाद हो गए….
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/सी.एम्. शर्मा (बब्बू)

रकीब = प्रतिद्वंद्वी/प्रतिस्पर्धी
नाशाद = दुःखी

बे-तकल्लुफ “आंद” काफिया नज़रअंदाज़ कीजिये

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 19/07/2018
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 19/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 19/07/2018
  3. meena29 19/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 24/07/2018
  4. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 19/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 24/07/2018
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 19/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 24/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 24/07/2018
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 19/07/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 24/07/2018

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