ये कैसा पुरुषार्थ निभाते हो..

क्या तुम पुरुष हो ?
अगर हो,तो फिर ये कैसा
पुरुषार्थ निभाते हो
मुझसे ही जन्म लिया
और मुझे ही रुलाते हो
मेरे सीने से लगकर दूध भी पिया तुमने
और हर वक़्त मेरे सीने पर
गन्दी नजर भी जमाते हो
ये कैसा पुरुषार्थ निभाते हो

क्या तुम वाकई पुरुष हो?
अगर हो,तो फिर ये कैसा
पुरुषार्थ निभाते हो
कितनी कुर्बानियां दे कर पाला तुम्हे
ये कैसे भूल जाते हो
मुझे देख कर सड़को पर
तुम भद्दी फब्तियां कसते हो
मौका मिलते ही मुझे दागदार कर जाते हो
ये कैसा पुरुषार्थ निभाते हो.

तुम्हे जन्म ही क्यों दिया जाय
जो नजरे मेरे सीने को ताड़े
उसे क्यों ना फोड़ दिया जाए
जो हाथ मेरे जिस्म को चीरने को उठे
उसे क्यों ना काट दिया जाए
क्यों नही तुम्हे कोख में ही मार दिया जाए
मुझसे है अस्तित्व तेरा
क्यों मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हो
ये कैसा पुरुषार्थ निभाते हो–अभिषेक राजहंस

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/07/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 19/07/2018

Leave a Reply