घरौंदे की रेत

शायद पसीने की बूँद उसकी

अब गर्मी पैदा करती नहीं

और तिस्कारित जीवन से

मुक्ति उसे मिलती नहीं

दीन-हीन हो गया

जीवन देने वाला अब

देखो पैर से बड़ा हो गया

उसके दिल का छाला अब

चाहता है कड़वी बातों में

कोई मीठा खिला दे उसे

उसके ही आशियाने में

दो साँस दिला दे उसे

ये अंतर्द्वंध का कोढ़

देने वाला उसका बच्चा है

पोषण देने से इंसान को

पशु पालना अच्छा है

उठती है टीस अब

जख्मी हुऐ हालातों से

उसके घरौंदे की रेत जब

फिसलने लगी है हाथों से

10 Comments

  1. rakesh kumar Rakesh kumar 16/07/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 16/07/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 17/07/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 16/07/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 17/07/2018
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 16/07/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 16/07/2018
  6. rakesh kumar Rakesh kumar 17/07/2018
  7. rakesh kumar Rakesh kumar 17/07/2018

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