चली जा रही हूँ

सावन की रातों में
झडी़ जम के बरसती
फूलों और पत्तों से
अठखेलियाँ सी करती
अजब हैं नजा़रे
गरमीयों के मौसम में
कभी आग बरसती
कड़ाके की सर्दी में
शीत सिहरन सी भरती
देखते ही देखते
उम्र जाती है गुज़रती

हर दिन छोड़ जाता है यादें कई

लिए बारात यादों की ,
संग चली जा रही हूँ
है मंज़िल कहॉं
मैं जानती नहीं
इक अनजान से सफ़र पे
चली जा रही हूँ
डगर लम्बी है मगर
गुनगुना रही हूँ

ख्तम होगा कब
यादों का कारवाँ
न है कोई ख़बर
और कोई पता भी कहाँ
यादों में ही बस
बही जा रही हूँ
सावन की बरसती बूँदों का
सौंधी मिट्टी की ख़ुशबू का
लु्तफ उठा रही हूँ
जहाँ ले जारी है ज़ि्न्दगी
बस चली जा रही हूँ
चली जा रही हूँ

8 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/07/2018
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 04/07/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 04/07/2018
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 04/07/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/07/2018
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 05/07/2018
  4. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 05/07/2018
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 05/07/2018

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