नदी बो दी….

रोप दी नदी….
पास नदी नहीं थी-
न तो पहाड़ पास था,
सोचता रहा आंगन में नदी को लाउं,
पहाड़ को रोप दूं तुलसी के बगल।
पर क्या संभव था,
नदी को आंगन में लाना,
पहाड़ को रोपना चांपा कल के पास,
चाहना तो क्या है,
सोचा आसमान को धर दूं,
खुले छत पर।
नदी ख़ामोश थी,
पहाड़ चुप्प,
किसी ने कुछ नहीं कहा,
कहने को,
ये सब मेरे हमारे सबके थे,
पास-पास।
छत पर बो कर बोनजाई पेड़,
आम अमरूद और गुलदावदी,
मान लिया जंगल लगा दिया,
पहाड़ का क्या था,
पहाड़ न सही पेड़ तो लहलहाने लगे,
नदी तो थी नहीं पास,
आंगन में बहाना चाह नदी,
मगर नहीं मिली जगह,
सो गुसलख़ाने में बनाकर बाथ टब,
फिर छत पर स्वीमिंग पुल,
खुश हुआ।

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 23/06/2018

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