पापा की याद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

साये की तरह साथ देने वाले
मैंनें अपने पिता को खोया था।
आज फिर से याद आ गयी उनकी
आँखें अपने आप ही रोया था।

ठोक कुम्हार सा सुन्दर सुघड़ बनाया
एक एक फूल हारों में पिरोया था।
याद भी आयी उस पल की जो हमें
हमको अपने कांधो पर ढ़ोया था।

आज ऐसा वही फल मैं हूँ उनका
जो पापा ने सींचकर बोया था।
आज जहाँ हूँ गर्व होता मुझे अब
जिसने उंगली पकड़ दिल टोया था।

3 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/06/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 18/06/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 19/06/2018

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