तू देख मेरे हुनर को देख

तू देख मेरे हुनर को देख

देख ज़िन्दगी को
 मेरी नज़र से देख

बिखरे हैं रंग कैसे२ रंगीनियों को देख

नहीं कमी कुछ भी कहीं

जा के आते नज़ारों को देख

कहीं झुक रहा है आस्मां

कहीं चमक मेरी तारों में देख
नहीं अछूता मुझ से कोई

बन के पानी बहता हूँ मैं

कभी बनके तूफां

हवाओं को भी दहलता हूँ मैं

चहचहाअट में पंछिओं की
 चेह्चहाता हूँ मैं

बादलों को गर्जना
 भी सिखाता हूँ मैं

असीम प्रकाश बन
 रोशनी फैलता हूँ मैं

चीटिओं की दुनिआ
 भी बसाता हूँ मैं

चिंघाड़ना हाथिओं को
 बताता हूँ मैं

छोटे से छोटे कण में
 भी समाता हूँ मैं

कभी शिखर हिमालय का
 बन जाता हूँ मैं

चाहूँ कभी तो
 बादल बन बिखर जाता हूँ मैं


कुछ भी दिखाई देता है जो

देख बनाई मेरी नज़र को देख

कैसे जतन से बनाई है यह कायनात

तू देख मेरे हुनर को देख

बम्ब विस्फोटों पे इतराता है तू

हिला दूँ ज़मीं ज़रा सी तो

फिर देख. मेरे असर को देख

फूलों में मेरी नज़ाकत को देख

समंदर में मेरी ताक़त को देख

देख कभी तू गौर से देख

बसा हूँ हर पल में,हर क्षण में देख

हर उन्चाई ,हर गहराई में

ताक़त मेरी समाई को देख

तू देख तो बस मेरे हुनर को देख

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/06/2018
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/06/2018
  3. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 17/06/2018
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/06/2018
  5. C.M. Sharma C.M. Sharma 18/06/2018
  6. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 18/06/2018
  7. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 19/06/2018
  8. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 19/06/2018

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