प्रीत छलक जाती है- शिशिर मधुकर

मैं कितना भी छिपाऊं पर, प्रीत छलक जाती है
तन्हाइयों में हर पल बस एक, याद तेरी आती है

मैं सोचती हूँ जब भी, ख्यालों में तुम ही आते हो
आँखों में ख्वाब तेरे , और हाथों में वो ही पाती है

इस प्रेम के नशे का कोई, आनन्द तो ले के देखे
मस्ती में झूम झूम कर, हर धड़कन मेरी गाती है

सब कुछ था पास मेरे, पर फिर ये समझ आया
एक प्रीत ही जीवन में , असली खुशी लाती है

यह खेल समझना है तो, दीपक को ज़रा देखो
जिसके मान के लिए सदा, मधुकर जली बाती है

शिशिर मधुकर

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