प्यारी सी घटा – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

उमड़ती -घुमड़ती -मचलती,ये मद मस्त सी घटा
कारी – कारी कटारी, कजरारी, प्यारी सी लटा।
कभी गरजती, कभी बरसती, कभी चमकती ऐसे
सनन- सनन – सन पुरवाई, अंगड़ाई सी ये छटा।

इतराती बलखाती रिमझिम, रिझाती ये बहुत है
मनमानी मस्तानी जियरा, उफानी भी बहुत है।
कभी सताती, बेग से धाती, बन जाती उत्पाती
तांडव करती, जनता मरती, पानी भी बहुत है।

कभी बादल फट जाता तो, कभी कट जाती नदियाँ
खूब तबाही करती है, जब भर आती है नदियाँ।
गाँव – गाँव, शहर -शहर में, होती है खूब तबाही
बिना मौत के मर जाते, जो हम सब में है कमियाँ।

कभी आँधी तूफान रुलायी, कभी जलायी गर्मी
है किसान का कर्ज हमारा,मरते मजदूर कर्मी।
बड़े – बड़ो की बात अलग है,ऐसे वैसे ठग हैं
इंसान बेचारा क्या करे, जब लोग बने अधर्मी।

3 Comments

  1. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 08/06/2018
  2. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 11/06/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 13/06/2018

Leave a Reply