आकर देखो इन ‘वन’ में

भीतर किसी तरुणाई पर

खग मृग अकुलाते हैं

इनके घने अंधेरों में

गूंगे भी शोर मचाते हैं |

निष्ठा भी अंगड़ाई लेती

इनके हरे बिछौनों पर

जाने कितने जाल बुने हैं

इनके कोनो-कोनो पर |

शीतल सुगन्ध ,जल तरंग

कोपल प्रफुटित, जलज अंग

मृणाल सुशोभित,हर्षित रंग

मनभावन है चन्दन सुगन्ध |

लताऐं लिपटी हैं निहंग

शान्त कुपित,छिपे भुजंग

सीमा समाहित जीव अनन्त

छिपी चिंगारी पाषाण प्रचंण्ड |

सरसराती विप्लवी घास

घनघोर अन्धेरा छिपा आकाश

कीचड़ दलदल है पलास

मखमल,सुन्दर,रज सुभाष |

वृक्ष सीना तान खड़े हैं

धरा पर अपना मान बड़े हैं

ये अब शीश झुकायें नहीं

शिखर पर्वत समान अड़े हैं |

सर-सर,सर-सर ,ध्वनि अविरल

झर-झर,झर-झर,पवन सजल

अबोध, आनंदित फूल फल

कल-कल बहते झरने निश्छल |

निकल श्वान चिल्लाते हैं

पथिक तनिक घबराते हैं

विकट शोभती छाया में

कभी-कभी सुस्ताते हैं |

इन ‘वनो’ सा गान कहाँ

ये जीवन स्वर्ग समान कहाँ

निरीह,अगोचर जो जग में

ये सोन सुसज्जित खान कहाँ |

प्रवाह तड़ित होती तन में

अनुराग घुमड़ता है मन में

शाह भी शीश झुकाते है

आकर देखो इन ‘वन’ में |

10 Comments

  1. sukhmangal singh 30/05/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 30/05/2018
  2. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 30/05/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 30/05/2018
  3. Abhishek Rajhans 30/05/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 30/05/2018
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 30/05/2018
    • rakesh kumar rakesh kumar 30/05/2018
  5. C.M. Sharma C.M. Sharma 31/05/2018
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/05/2018

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