सुख की तलाश – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

सुख की तलाश में, दुख झेलता रहा
मुसीबतों के पहाड़ से, खेलता रहा।
जिसकी थी जरूरत, वह भागती रही
नसीब खराब था,जो उसे देखता रहा।
बेरहम सी दुनिया, क्या जाने प्यार
खुले बाजार में, जमीर बेचता रहा।
जिस पर था भरोसा, बन गया काफिर
शैतान हर मोड़ पर, राह छेकता रहा।
भूल हो गई बिन्दु, तुझको समझने में
तुम फंसते गये, वह जाल फेकता रहा।

4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/05/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/05/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 29/05/2018
  4. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 30/05/2018

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