मैं भी इन्सान हूँ

नज़र जो तुमने फेर ली, नहीं है कोई गिला
मेरी वफ़ाओं का अच्छा दिया है तुमने सिला

तुम्हें समझ सकूँ, ये बस में नहीं था मेरे
मेरी नज़र का वो पैगाम, कहां तुमको मिला

है तुमने गै़र की आंखों में बसेरा जो किया
ये दिल है टूट गया और मेरा वजूद हिला

न तुम से कोई थी उम्मीद, न शिकायत ही
न सही जाम, मुझको एक घूंट ज़हर पिला

तेरे सितम से मेरी आंख क्यों न होगी नम
मैं भी इन्सान हूँ, पत्थर की नहीं कोई शिला

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