अपना मिलन

क्षितिज पर मिलती रेखाओं सा

अपना मिलन या सिर्फ आभास

कोरा एक आभास जो

गूंजता है चहूँ ओर

साक्षी हैं जिसकी नजरे

पर जो होता भी नहीं

और कहते हैं जिसको

शुभ मिलन हम दोनों का

एक अन्तर्मन में कचोटती

व्यथा की तुम कितने मेरे हो

कौन सा किनारा है जहाँ से

मैं शुरू होती हूँ और तुम खत्म

कौन मिटाएगा वो रेखाएँ

जो बाँटती हैं हमें

स्त्री और पुरुष में

क्या है कोई जो एक बार

अनन्त,जन्म-जन्म तक

सब सीमाओं के पार

प्यार की वादियों में कहीं

घोलकर मिला दे हम दोनों को

रंग सा और बिखेर दे

उन पहाड़ों पर दूर तक

जहाँ हमें कोई समेट ना सके

और वापस चुनकर निकाल ना सके

हमें फिर कलियों से

जैसे नदी निकलती है

पर्वत के रोम-रोम से

मैं भी बहती रहूँ अविरल

तेरे आलिंगन से

काश ऐसा हो

अपना मिलन

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  2. rakesh kumar Rakesh kumar 28/05/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/05/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 30/05/2018

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