पता नहीं क्या

शीर्षक–पता नहीं क्या
पता नहीं
क्या हक़ था मेरा
जो तुम्हे अपना समझने लगा था
तुम बस मुस्कुराई थी
और मैं सपना देखने लगा था

पता नहीं
क्या था तुम्हारी आँखों में
मैंने तो बस झाँका था
और डूबता चला गया था

पता नहीं
क्या था तुम्हारे पायल की झंकार में
तुमने बस सुनाया
और मैं गाता चला गया था

पता नहीं
क्या था तुम्हारे उड़ते केशो में
तुमने बस था समेटा
और मैं उलझता चला गया था
-अभिषेक राजहंस

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/05/2018

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