बेशर्मी की पहचान

आज ये शहर क्यूँ वीरान पड़ा है

हर कोई यहाँ अंजान खड़ा है

फटे हैं शायद किसी जमीर के कपड़े

तमाशा देखने हर मेहमान खड़ा है |

मजबूरी में जो निबाह करते हैं

पलकें झुकाने का गुनाह करते हैं

वो औढ़ते आँचल अपनी हया के लिए

कुछ उसके टुकड़े बेपनाह करते हैं |

अंजान थी मैं भी इस दर्द से

जो लेकर हर निगेबान खड़ा है

कोई उठाकर दे दे मेरा दुपट्टा

नजारा देखने जो शैतान खड़ा है |

मैं अबला बनकर आई

इसमें मेरा क्या गुनाह है

हर गली में जो देते हो

वो किस बात की सजा है |

उठ नहीं पा रही दर्द से

क्या उम्र भर उठ पाउंगी मैं

चलती हूँ गर्दन झुकाकर

और कितना झुकाऊँगी मैं |

मैं भी तेरी तरह एक इंसान तो हूँ

तुझे पैदा करने वाली पहचान तो हूँ

दूध को खून बनाने वाली जननी नहीं

तेरी बेशर्मी की पहचान तो हूँ |

7 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 28/05/2018
    • rakesh kumar rakesh kumar 28/05/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 28/05/2018
    • rakesh kumar rakesh kumar 28/05/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/05/2018
  4. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 28/05/2018
    • rakesh kumar Rakesh kumar 28/05/2018

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