बेगैरत

आबरू मेरी चाहतों की

रोज ही लुटती है

तमन्नाओं के तकिये पर

सपने रोज सिसकते हैं |

मुक़द्दस्त मालिक हो गया

देखो ये जहां मेरा

मुझे उधर घूमाते हैं जिधर

अच्छा समझते हैं |

चीखें भी मेरी ख्वार

बड़ी बेआवाज उफ्फ

लोग रोना समझतें हैं

जब आँशू टपकते हैं |

लुटते भी हैं हम

अपने ही हकीम से

वो दवा करते हैं हम

दुआ के लिए झगड़ते हैं |

शाही खिताब लूटने का

है दौर ज़माने में

ऊपर उठते लोग जाने

कितनों को कुचलते हैं |

गले लगाकर अश्क

पौछने की है आदत मुझे

जाने क्यूँ लोग मुझे

बड़ा बेगैरत समझते हैं |

2 Comments

  1. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 26/05/2018
  2. rakesh kumar Rakesh kumar 26/05/2018

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