दगाबाज

खुद की कीमत कम आंकी मैंने

अब हर कोई खरीदार लगता है

जब से छोड़ा मैंने रोना

हर कोई मददगार सा लगता है |

दबाते हैं हंशी मुस्कुराहटों के पीछे

आज हरकोइ तीमारदार लगता है

कीमतें गिर गई चाहतों के वसूलों की

आज हर कोई दुकानदार लगता है |

रूश्तमे हिन्द भी बोलता है देखकर

सियासत में एक व्यापार सा लगता है

खाते हैं बेपनाह तमाचे वफ़ा इश्क में

जिन्हे इस देश से कुछ प्यार सा लगता है |

मैली आँखें देख नहीं पाती बेशक

इनका पानी बेकार सा लगता है

दामन कितना भी फैला लें ये अनाथ

इनसे रूठा इनका भरतार सा लगता है |

मैं रोज मिलता हूँ इंसानो से ,शायद वहम

गर्त में दबा हर नरकंकाल लगता है

आश तो जैसे उजड़ गई मेरी

यहां हर दगाबाज पहरेदार सा लगता है