माहताब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

बागों के इस चमन में, माहताब हो तुम
फूलों सा महकता, कोई गुलाब हो तुम।

नुरानी ये गाल पर, गुलमोहर सी चमक
नजरें इनायत, जैसे की शराब हो तुम।

तेरा तबस्सुम, मुझे भी अब मार डालेगा
परियों के हुस्न सी, लाज़वाब हो तुम।

तुम से ही तो,महफिल होती है गुलज़ार
रोशनी भर दे, ऐसा आफताब हो तुम।

रसीले होठ, तेरे कम्बख्त ये नखरे
दीवानों के ख्यालों में जवाब हो तुम।

बख्शना है अगर,तो हम बिन्दु को बख्श दे
हर इक तड़पते हुए दिल का,ख्वाब हो तुम।

8 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 22/05/2018
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 22/05/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/05/2018
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 22/05/2018
  3. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 22/05/2018
  4. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 22/05/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 22/05/2018
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 23/05/2018

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