जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं

जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं

कितना कुछ बदल जाता है
सारी दुनिया एक बंद कमरे में सिमिट जाता है
सारी संसार कितना छोटा हो जाता है

मैं देख पता हूँ, धरती के सभी छोर
देख पाता हूँ , आसमान के पार
छू पाता हूँ, चाँद तारों को मैं
महसूस करता हूँ बादलो की नमी
नहीं बाकी कुछ अब जिसकी हो कमी
जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं ….

पहाड़ो को अपने हाथों के नीचे पाता हूँ
खुद कभी नदियों को पी जाता हूँ
रोक देता हूँ कभी वक़्त को आँखों में
कभी कितनी सदियों आगे निकल आता हूँ
जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं ….

कमरे की मेज पर ब्रह्माण्ड का ज्ञान
फर्श पर बिखरे पड़े है अनगिनित मोती
ख़ामोशी में बहती सरस्वती की गंगा
धुप अँधेरे में बंद आँखों से भी देखता हूँ
हर ओर से आता हुआ एक दिव्य प्रकाश
जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं ….

11 Comments

  1. hindi article 20/05/2018
  2. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/05/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/05/2018
  4. C.M. Sharma C.M. Sharma 21/05/2018
  5. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 21/05/2018
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/05/2018

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